Wednesday, 6 April 2016

Aag Jalni Chahiye - Dushyant Kumar Poem






हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

-
दुष्यन्त कुमार


Ho gayi hai peer parvat si pighalni chahiye,
Iss himalay se koi ganga nikalni chahiye.

Aaj yah deewar pardon ki tarah hilni chahiye,
Shart lekin thi ki ye buniyad hilni chahiye.

Harr sadak parr, harr gali mein, harr nagar, harr gaaon mein;
Haath leharte hue, harr laash chalni chahiye.

Sirf hungama karna mera maksadd nahin;
Saari kosish hai ki ye soorat badalni chahiye.

Mere seene mein nhi toh tere seene me hi sahi,
Ho kaheen bhi aag, lekin aag jalni chahiye.

- Dushyant Kumar 

1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 01सितम्बर 2018 को लिंक की जाएगी ....http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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